Tuesday, February 19, 2013
Monday, February 18, 2013
बसंत
मित्र !
अभिजात्य
रेशमी-शॉल ओढ़
कांधों पर
नागरीय-शकुनी का शव धरे
दु:शासनी मकढ़ी के जालों
दुर्योधनी द्वेष की गर्द में
आंकठ डूबे
अपने भीतर-बाहर के सेभी द्वार बंद कर
हरियल खेतों की मेड़ों पर
गेहूँ की बालियों
सरसों के पीले फूलों
महकाते धनिया
बौराई अमराइयों की
बासंती-गंध को
श्वासों में कैसे भर पाओगे ?
मित्र !
अपने को ''मैं'' से मुक्त करो
कोकिला के स्वर में स्वर मिलाओ
भंवरों के गुन्जन के संग-संग
मन को उन्मुक्त हो उड़ने दो
फिर बसंत को
अपने भीतर
खिलखिलाता पाओगे।
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Sunday, January 13, 2013
नेहर आंगन लगे बिराने
नई दुल्हनिया
खड़ी अटरिया
निरख नम-नयन काजल
लगी हिलहाने।
सुलगती धूप
अंचरा छुपा/बदरिया
शीतल झरी से
भिजो गई चुनरिया
माटी को
सौंधी/बांट रही
घर-घर पुरवा
जा बैठी
सिरहाने।
दादुर, मोर, पपीहा/ढाई आखर
प्रेम के रहे बांच
तन-मन-प्राणों में
ठंडी-ठंडी आंच
अंकुरित दूर्वा सी
नचते मोर-पंखों सी
कसमकस
लगी नस-नस पिराने।
सुनी सांवनी रातें
बिजुरिया खेले/आंच मिचोली
जबरन घुस चौबारे
फुहारे करें ठिठोली
नेहर-आंगन
सखी सहेलियां
अपने लगे
अब बिराने।
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Friday, January 11, 2013
गज़ल
थूक कर चाटते हैं,
कितने लोग विचित्र हो गए।
गिरगिट की तरह बदलते रंग,
कैसे चरित्र हो गए।
जलती चिताओं की,
आग पर सेकते रोटियां ये
बाजीगार, बटमार, रहजन,
कैसे मित्र हो गए।
इस दौर में देखो हर ऊसूल हैं,
कागजी-फूल,
खुशबू के भी खतरे हैं,
सब नकली, इत्र हो गए।
रातों के अपराध से,
दहशत ज़दा है चॉंदनी
छूने से उनके ख्वाब,
चॉंद के अपवित्र हो गए।
सब गवाह है,
सब अपराधी यहां मुन्सिफ भी, यारों।
कि इजलास में नाकारा,
''बापू'' के चित्र हो गए।
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