Thursday, January 10, 2013
Wednesday, January 9, 2013
स्वर्ण-मृग का लालच
वो खुशबू कहां नागफनियों में,
जो है तुलसी की मंजरियों में।
सदाचार, सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम्
है कहां विज्ञपित किन्नरियों में।
अनावृत परिधानों में कहां वो,
लावण्य जो लहंगा-चुनरियों में।
सखी, पतित-पावनी कलकल गंगा,
हंसती कि तुम्हारी चूडि़यों में।
भारतीय संस्कृति का संगीत,
रुनझुंन तुम्हारी पैजनियों में।
रंगों के कि पतंगों के उत्सव,
यहां बच्चों की किलकारियों में।
स्वर्ण-मृग का लालच कहीं तुम्हें,
ले न जाए अंधियारी गलियों में।
-------
Thursday, December 27, 2012
ये इन्द्रियां
सुबह हो/ या शाम
सनसनाता झुलसाता दिन हो/ या ठंडी रात
अकेला हो मन/ या कोई हो साथ
हर पल/ हर क्षण
कान खड़े किए/ श्वान सी घाणेन्द्रियां
कुलबलाती/ दसों इंद्रियां
बतियाती रहती है/ आपस में
बात-बेबात
जब भी होता है/ अनायास कोई खड़का
झन-झनाहट करता/ गिरता है कोई बर्तन रसोई
में
खदबदाता है कुछ/ बटलोई में
लगता है/ तड़का
या फिर गली में/ भौंकता है कुत्ता
उचकाकर/ गदरदनें
अधखुली खिड़कियों से
झांकती है/ आंकती हैं
धूप अंधेरे में/ मिचमिचाती आंखों से
बांचती है/ अपने भीतर का डर
फुसफुसाकर/ दुबक जाती है
जैसे कि तूफान के भय से
रेत में छुपा लेता है/ गर्दन शुतुरमुर्ग
बजाय तन कर/ खुद अस्त्र बन
सामना करने तूफान का।
-----
Tuesday, December 25, 2012
मोह घर का
खजूर की लम्बी/म्यालें
लाचार है अब/बोझा ढोने में
छप्पर का।
दरख्त थे जो भी/छायादार
उखड़ गए-
पुश्तैनी जमीन से/लोगों के
पांव।
लरज़ते बोल/अलगोजे के
खो गए-
रूप-रस-गंध वाले
गांव।
शहतूती रिश्तों को
लील गया/जादू
शहर का।
पसीने में भीगी/छोटी-छोटी
खुशियों पर
मौसम ओले/बरसाए।
कुंआरी
मेहंदी
वाली हथेली के
चटक
रंग/धुधलाए।
ढह
गया/भरभरा कर
मिट्टी
की सौंधी
गंध
वाला/मोह घर का।
-----
Saturday, December 22, 2012
मरू का ढाणी-गांव
धू-धू जले
धरती धोरां री
ज्यूं आव
जीवड़ों कलपे
पाणी-पाणी
मेघ-बाबा जल्दी आव।
श्रीहीन खेजडि़यां
ठूंठ खड़े रूंख
मनख डोर-डांगर
तरस्यां मर गया भूख।
नेतारी/बांच्छयां खिल गई
रेत पे तैरावे
कागद री नाव।
सूना पड्या झूंपा
सायं-सायं बोले बायर्ड़यो (हवा)
ठहाका मारे चारूं खूंट
अकाल माथे खड़यो।
जहां-तहां पड्या/मृत जिनावर (जानवर)
मरघट सो लागे
मरू ढाणी गांव।
आसवासना (आश्वासन) री अफीम
खातां बी गई सदी
गूजर रा फूल हुई
रेल मे जल री नदियां।
पेहरूआं रा घर/बिना दूब रा गलिचा
करज चकाती जणता (जनता)
चाले आप पे नाग्या (नंगा) पांव।
----
Subscribe to:
Posts (Atom)




