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Thursday, December 20, 2012

गाना है मंगल नव-विहाग




अब तो
नीम-नींद से जाग
श्रम-शिव!
जाग जाग रे जाग।

गहन अंधकार की कलाई
तू नहीं तो कौन तोड़ेगा?
छल-कपट द्वेष-ईर्ष्‍या – घट
तू नहीं तो कौन फोड़ेगा?

छोड़ अब
श्‍मशानी-वैराग्‍य
चिलम की
चेता रे तू आग।

तेरी कामधेनू-फसलों का
नीर-क्षीर पी रहे सपोले
नहीं समय यहां किसी को
देख तो जन के फफोले।

यों न व्‍यर्थ
कोसता रह भाग
छू ले
नभ लगा के छलांग।

आक्रांत संगीत-शेर में
गुम हुए अलगोजे के स्‍वर
तेरे सपनों के गांव-छांव
चंदन-बन आ बसे विषधर।

तुमको ही
कील कर ये नाग
गाना है
मंगल नव-विहाग।
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Tuesday, December 18, 2012

अधरों पर धरो बांसुरी सुरीली



हर तरफ
पसरा रेत का समन्‍दर है
उड़ रहे
चहूं ओर गर्म बवण्‍डर है
दूर तक
नहीं वृक्ष अभिशप्‍त छांव है
आग पर
चलने को यों विवश पांव हैं
रेत में
हो गई गुम नेह की नदियां
बींध कर
देह को चलते अग्निश्‍र हैं
सुमन मन
थे जो आज बबूल हो गए
स्‍वर्ण-मृग
अब ‘’राम’’ को कबूल हो गए
सत्‍य–मति
रास आती न ‘विदुर’ को भी
कंठ तक
आते न स्‍वर, मौन अधर हैं
भू-धरा का भी हो रहा कंपित गात
दीन की
आंख से हो रहा अश्रु-पात
मिलने से
पहले ही बिछुड़ गया डार से
फूल के
घर रास रचाता पतझर है
यही तो
’धर्मचक्र’ नहीं और न जीवन
ज्ञान-धन
वह जो करता शांत मन
निज रूप
निखरो ‘जन-गण-मन’ कितना विकल
प्‍यास से
दूर अभी मानसरोवर है
हर अधर
पर धरो बांसुरी सुरीली
गीत में
उतरने को आतुर हंस-स्‍वर है।
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Monday, December 17, 2012

पहुंचे कैसे सितारों तक?



पहुँच गए कि चन्‍द
मसखरे/बुद्धि के बौने
गांव-गली से चल
सत्‍ता के गलियारों तक।
गुम हुए सब
उजले सपने गांव-ढाणी के
बिना मजूरी के
भूखे प्‍यारे पानी के
बुढि़या गए
उम्र से पहले मासूम छौने
जूँ नहीं रेंगती
कानों पर सरकारों तक।
बेगम/गुलाम इन
शतरंजी शहमातों से
भीष्‍म करता है
सिर्फ शिखण्‍डी घातों से
सच का मसीहा
सोता कांटों के बिछौने
झूठ का
अभिनन्‍दन होता दरबारों तक।
कटे पंख ले कर
पांखी का यूँ उड़ पाना
संभव नहीं है
बादलों के पार जाना
मंदिर-मस्जिद
मुंडेरों के जादू-टौने
कील गए राह
पहुंचे कैसे सितारों तक?
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Saturday, December 15, 2012

आम्र वृक्ष



मेरे
खेत की मेड़ पर
आज जो दिखता है
फलों से लदा/विनम्रता के भार से झुका
सहनशील, आम्र वृक्ष
शैतान बच्‍चों के पत्‍थर मारने पर भी
क्रोध नहीं करता/वरन् झूक कर
झूम कर फल टपकाता है,
इसके घने पत्‍तों के बीच बैठे
शुक-कोयल के बोल
हृदय में मधु घोलते हैं।
यह आम्र-वृक्ष
‘’क्राफ्टेड’’ नहीं है/शुद्ध देशी है
भारतीय
परोपकार ही इसका धर्म है
’’गुठली’’ से तैयार/ इसके पौधे को
स्‍नेह से सींचा है
ढोर-डागर से बचाने को
कांस के सट्टे/बबूल के झाड़ों का ढेर
चारों तरु लगा बड़ा किया है/ पाला है
बच्‍चों की तरह।
इसके बड़े में
मेरे रक्‍त एक-एक बूंद/पसीना बनी है
इसमें संतों की विनम्रता है/विनयी है
यह सर से सराबोर/रसाल है
इसकी
जातीय परम्‍परा का लम्‍बा इतिहास है
विभिन्‍न नाम/जाति के बावजूद
इसका गुण-धर्म मीठा है
हिन्‍दु-मुस्लिम/सिख इसाई
सब को प्रिय है
यह विश्‍व प्रिय
आम्र वृक्ष है।

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Friday, December 14, 2012

प्रहार कर प्रहार कर



प्रहार कर
प्रहार कर
दुर्दान्‍त के चरण पर
बना क्‍यों कंगाल
कर स्‍वयं से सवाल
भूमण्‍डलीयकरण फन
फैला रहा विकराल
नाथ इसे नाथ इसे
नाच-नाच-नाच
महाकाल के फन पर।
क्‍या झूठ क्‍या सांच रे
समय-किताब बांच रे
होने दे न ठंडी
तू भीतर की आंच रे
रीढ़ पर तू
हो खड़ा
अरि-सन्‍मुख तन कर
नाच-नाच-नाच महाकाल के फन पर।
कि तिजोरियों में बंद
है पसीने की गंध
छलते आ रहे तुझे
ये सत्‍ता के अनुबन्‍ध
आंधियों सा
बढ़ा चल
हो आरूढ़ वरूण वक्ष पर
नाच-नाच-नाच महाकाल के फन पर।
निहार मत बणी-ठणी
चार की दिन की पावणी
पक गई फसल थाम
हंसिया कर लावणी
लिख नाम
अपना अमिट
मिट्टी के कण-कण पर
नाच-नाच-नाच महाकाल के फन पर।
किरण-किरण बीमार है
पसरा अन्‍धकार है
कौन गाए भैरवी
कि मौन गीतकार है
पूरब से 
लाल-लाल
चढ़े सूर्य गगन पर
प्रहार कर
प्रहार कर
दुर्दान्‍त के चरण पर
नाच-नाच-नाच महाकाल के फन पर।
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