Wednesday, November 14, 2012
भीड़ का दस्तूर
Monday, November 12, 2012
आँखों- आँखों में.....
Sunday, November 11, 2012
पानी का दर्द
पानी में खड़े लहरें
न गिनना, यारों।
व्यर्थ है पानी पे
इबारत लिखना, यारों।।
डूब के गहरे पहले
सागर की तह नापो,
फिर कहीं सागर का
इतिहास सुनना, यारों।
उपलब्धियों के नाम
अंजुरी भर रेत में,
व्यर्थ है सीपियां
औं घोंघें चुनना, यारों।
डूबते के लिए तिनके
का सहारा बहुत-
होता है, मुश्किल है वह
तिनका बनना, यारों।
पानी के दर्पन पे
पैंक कर कंकरियां,
अच्छा नहीं पानी का
दर्द गुनना, यारों।
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Saturday, November 10, 2012
फाल्गुनी बयार में
हल्दिया सरसों लहके,
फाल्गुनी बयार में।
वन-उपवन, खेत गमके,
फाल्गुनी बयार में।।
रंग-बिरंगा आज फिर
हुआ मन का मधुबन,
धूलि चंदन-सीर महके, फाल्गुनी बयार में।
अनायास ही जग उठी, अन्तस में लालसा,
लाल टेसू जब दहके, फाल्गुनी बयार में।
बांध सुमनों की वेणी, पहने सन-बिच्छिया,
ग्राम्य यौवना ठुमके, फाल्गुनी बयार में।
आए दिन उमंगों के, गणगौर पूजन के,
कि रूप प्रिया का दमके, फाल्गुनी बयार में।
Friday, November 9, 2012
मरु के गांव
फिर गुल खिला रहे
चुनाव, मरु के गांव।
रेत में जैसे धंसे
नाव, मरु कि बोव।।अक्षरों की भाषा से बेखबर आदमी,
जी रहे भूख और अभाव, मरु के गांव।
इस ढाणी से उस ढाणी तक, यहां-वहां,
धूप ही धूप है न छांव, मरु के गांव।
रेत ही रेत पसरी हुई आँखों में,
प्यासे कुएं-खेत कर रहे सायं-सायं,
अब ताक हर तरु भटकाव, मरु के गांव।
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Thursday, November 8, 2012
क्यों दूरियों का पुल
मन आज बहुत विकल,
प्राण! सुन-सुन कल-कल।
पास इतने फिर भी, क्यों
दूरियों का पुल ?
सुर्ख रुखसारों पे, खिले ये लाल कमल,
विहंसते कजरारे नटखट नयन चंचल।
झंकृत जल तरंग लख उन्नत श्रीफल,
चढ़ा नशा जाए न उतर रूप का जल।
श्वासों का कपूर, प्रिये! उड़ रहा पल-पल,
मुहूर्त प्यार का जाए न कहीं टल।
फिर फिर झुमकाओं रूनझुन-रूनझुन पायल,
रहें या न रहें हम रहेगी प्रणय-ग़ज़ल।
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