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Friday, September 28, 2012

एक प्रश्‍न



सुनो !
मेरे राजनेता
सुनो!!
मेरे छोटे-से प्रश्‍न का उत्‍तर दे सकोगे ?
क्‍या
नए वर्ष
शिशिर में ठिठुरती/कोहरे में लिपटी
सुबह में,
नई आशा के साथ
राष्‍ट्र समृद्धि/ खुशहाली के लिए
गुनगुनी धूप
मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारे, चर्च का
अभिषेक करेगी ?
भूख से बिलखते/मां की सूखी छातियों को निचोड़ते
कल के सपने के उल्‍लास में,
इन भोले मासूम बच्‍चों को
बिना किसी दुराव के
नए वर्ष में
दे सकोगे चुटकी भर मुस्‍कान ?
आंगन में खांसते/बीमार वर्तमान पर से
जवान होती आकांक्षाओं का
उठने लगा है विश्‍वास,
और
नई कृति बनाने के लिए
हर पल कुछ रचने की प्रक्रिया में जीना चाहता है
वर्तमान।
इसे आरियों से काटने का
प्रयास तो नहीं करोगे ?
दे सकोगे,
सम्‍पूर्ण खुला आकाश
वर्तमान को
नए भविष्‍य के लिए ?
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Thursday, September 27, 2012

दूर टेरती बांसुरी


मंदिर के स्‍वर्ण कलश से
सरक जाती है जब धूप,
होठों पर मुखर हो आता बरबस तुम्‍हारा नाम।
यह गोधूलि, सांझ अकेली,
श्‍यामल सी छाया मैली
चहचहाते नीड़-नीड़ में,
लौटते पक्षी भीड़ में
द्वार पर रख जाते है गुमसुम-सी बुझी-बुझी शाम।
होठों पर मुखर हो आता है बरबस तुम्‍हारा नाम।।

दृग मूंद सोती पांखुरी
दूर टेरती बांसुरी
निशा नशीली साथ न तुम
भीतर-बाहर तम, आंखें नम
तुलसी-चौरे पर टेरे कि पूजा का दीप-ललाम।
होठों पर मुखर हो आता है बरबस तुम्‍हारा नाम।।
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Wednesday, September 26, 2012

सूर्य



आंधियां
अवसादों के काले मेघ
भले
आच्‍छादित कर दें
आकाश को मगर
जो
विहग-विरूदावलियों के साथ
अन्‍धकार के सीने को चीन
धरती के अणु-अणु में
संचारित करता है
जीवन-शक्ति
वह
कभी अस्‍त नहीं होता
क्रांति का
सूर्य।
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Tuesday, September 25, 2012

भूख



बन्‍धु रे!
सड़कों,
गली-कूचों,
झुग्‍गी-झोंपडि़यों
उग आती है
सूरज डूबने के साथ
मच्‍छरों सी भिनभिनाती
जिस्‍म फरोशों की
भीड़
बू सूंघती
जिन्‍दा गोश्‍त की
और
बिकने लगती है
भूख।
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Saturday, September 22, 2012

फागुन



उसने
वक्‍त–बेवक्‍त
दर्द को
पसीने के घोल में
घोल-घोल कर
आशा और विश्‍वास की गंध से मिश्रित
जोगिया, बैंगनी, हरित, पीत रंगों के फूल
मेहनत की सुई से
खेत की हरियल सुनरिया पर
टांक दिए
और प्रकृति ने
बड़े दुलार से
रात के सन्‍नाटे में
ओस की बूंदों से
रंगों को और गहरा, चटक कर दिया
इसे मौसम के डाकिए ने
पीत पाती थमा कर
नाम दे दिया
फागुन का।
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Friday, September 21, 2012

समय एक नदी है

पूजा के अक्षत, फूल-पात
सब कुछ
धार के संग बह गया,
डूब गए
आस-पास, घाट
बाढ़ थी गुजर गई
समय एक नदी है,
नाम-रिश्‍ते
सभी नाम के हैं,
बैठे, चले गए
निभाना ही तो त्रासदी है,
एक घरौंदा
बचपन, यौवन
बुढ़ापा का
बना और ढह गया
सतही
रेत में
मोती नहीं
सीपियां ही सीपियां हैं,
बहार
कुछ नहीं
पेड़-शाखाएं
फूल-पत्तियां हैं,
बाद बीतने के
रिक्‍तता का अर्थ
सूनी मांग के
हाशिए तक रह गया।
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